Friday, 16 February 2018

शारीरिक रोगों का वर्गीकरण


शारीरिक रोगों का वर्गीकरण 

शारीरिक रोगों का वर्गीकरण -: हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के विकार होते हैं जिनके रूप और लक्षण अलग-अलग होते हैं इनका विभाजन आयुर्वेद में चार श्रेणियों में किया गया है।
1-      शरीर में विजातीय द्रव्यों के कारण जो रोग होते हैं वे शारीरिक रोग के अन्तर्गत आते हैं जैसे बुखार आदि।
2- अभिघात से जो पीड़ाएं होती हैं, उन्हें आगन्तुक रोग कहते हैं जैसे पेड़ से गिरना दुर्घटना आदि।
2-      क्रोध, शोक, भय आदि रोगों को निमित्तक मानसिक रोग कहते हैं।
4-भूख, प्यास, बूढ़ा होना तथा मृत्यु को प्राप्त होना स्वाभाविक रोग के अन्तर्गत आते हैं।

हमारे शरीर के आन्तरिक भाग में विजातीय द्रव्यों की उपस्थिति के परिणामस्वरूप जितने भी प्रकार के रोग होते हैं उन्हें दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। तीव्र रोग व मंद या जीर्ण रोग।

तीव्र रोग -: जिस रोग में अधिक तीव्रता हो उसे तीव्र रोग कहेंगे जैसे बुखार, हैजा, चेचक, उल्टी, दस्त, जुखाम, खाँसी आदि। ये रोग जितनी भी अधिक तेजी से आते हैं। उचित चिकित्सा करने से उतनी ही तेजी से जल्दी ही चले जाते हैं। तीव्र रोग अपना उपचार स्वयं होते हैं। जब हमारे शरीर के पाचन संस्थान में अधिक मल एकत्र हो जाता है तो उसका निष्कासन तीव्र रोगों के रूपों में होने लगता है जो कुछ ही दिनों में रहकर अर्थात उस संचित मल को शरीर से बाहर निकालकर अपने आप ठीक हो जाते हैं तथा शरीर का विकार अपने आप ही ठीक हो जाता है। तीव्र रोग बच्चों और युवाओं को अधिक होते हैं जिनकी जीवनीशक्ति प्रबल होती है, उन्हें विशेष रूप से प्राप्त होते हैं। शरीर में मल के निष्कासन में किसी प्रकार का अवरोध होने पर तीव्र रोग शरीर में अधिक समय तक बने रहते हैं। तीव्र रोगों में उपवास और व्यायाम बहुत अधिक लाभदायक सिद्ध होते हैं। यही कारण है कि तीव्र रोग के रोगी को चारपाई पर पड़ जाने के लिए प्रकृति विवश करती है। इसके साथ ही भूख को भी नष्ट करती है। तीव्र रोग का होना इस बात का प्रमाण होता है कि शरीर में जीवनीशक्ति सजग और सचेत है। डाक्टर लिन्डल्हार ने अपनी किताब नेचर क्योर में तीव्र रोंगों की पांच अवस्थाओं का वर्णन किया है।
प्रथम अवस्था-: प्रथम अवस्था को हम तीव्र रोगों की तैयारी की अवस्था कह सकते हैं। हमारे शरीर या उसके किसी भाग में मल के एकत्र हो जाने से शरीर में उत्तेजना पैदा होती है। इसके बाद यहीं एकत्रित मल धीरे-धीरे करके रोगों को उत्पन्न करता है। रोगों को उत्पन्न होने में कुछ मिनट से लेकर कई वर्षों तक का समय लग सकता है। इस दौरान शरीर में विभिन्न रोगों को उत्पन्न करने में सहायक मल, विष अथवा रोगाणु आदि उत्पन्न होकर एकत्रित होते
रहते हैं।
दूसरी अवस्था-:तीव्र रोग की दूसरी अवस्था में रोग का रूप और लक्षण पहले से अधिक भयानक हो जाते हैं जिसके कारण रोगी को अधिक कष्ट उठाना पड़ता है। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे शरीर में तनाव, सूजन, सुर्खी और बुखार बढ़ जाता है। इससे रोगी धीरे-धीरे शारीरिक रूप से कमजोर होता चला जाता है तथा रोग के बढ़ने के कारण अधिक पीड़ा और दर्द को सहन करना पड़ता है।

तीसरी अवस्था-:तीव्र रोग की तीसरी अवस्था में रोगाक्रान्त स्थान के कण नष्ट होने लगते हैं। जिसके कारण घाव हो जाता है तथा मवाद के साथ रक्त बहने लगता है जैसाकि फोड़ा होने की दशा में होता है। पसीना, पेशाब के साथ विष निकलने लगता है, सांस से दुर्गंध आने लगती है, दस्त होते हैं, उल्टी भी हो सकती है। मल निकलने के इस प्रयत्न में शरीर के कुछ उपयोगी तत्वों का भी मल के साथ ही निकल जाना स्वाभाविक होता है जिससे दुर्बल शरीर और भी अधिक शिथिल हो जाता है। मस्तिष्क भी काम करना बंद कर देता है। यही रोग की सबसे उग्र दशा होती है। यदि इस अवस्था में शरीर की जीवनीशक्ति कमजोर पड़ जाती है तो रोगी की मृत्यु तक हो सकती है। यदि जीवनीशक्ति प्रबल हो जाती है तो संचित मल को निष्कासित करने में सफल होकर संकट की घड़ी को पार कर जाता है तथा रोगी को रोगमुक्त कर देती है। कुशल चिकित्सक इसी अवस्था में जीवनीशक्ति को उचित उपचार द्वारा सहायता पहुंचाकर यश और कीर्ति का भागीदार बनता है।

चौथी अवस्था-: तीव्र रोग की चौथी अवस्था में रोग के नष्ट होने की शुरुआत होती है। इससे रोग धीरे-धीरे करके नष्ट हो जाता है, शरीर की सूजन, तनाव और सुर्खी आदि सभी कम होने लगती हैं, बुखार कम हो जाता है, सांस से आने वाली दुर्गंध समाप्त हो जाती है, दस्त और उल्टी भी ठीक हो जाती है तथा स्वाभाविक रूप से पसीना आने लगता है और शरीर को थो़ड़ा-से बल का अनुभव
होने लगता है।

पांचवी अवस्था-: तीव्र रोग की पांचवी तथा अंतिम अवस्था में रोग पूरी तरह से नष्ट हो जाता है। इस दौरान शरीर में एकत्रित हुआ पूरा मल साफ हो जाता है और जो भी उपयोगी तत्व नष्ट हुए तत्व होते हैं, वे धीरे-धीरे पुन: बनने लगते हैं तथा थोड़े ही दिनों में
शरीर हृष्ट-पुष्ट हो जाता है।

जीर्ण रोग (पुराना रोग) -:शरीर में उपस्थिति मल की उग्र दशा को तीव्र रोग या उग्र रोग के नाम से जाना जाता है। उसी तरह उसके भीतर प्रवेश करने, अनिष्ट दशा उत्पन्न करने तथा धीरे-धीरे करके थोड़े से कष्ट के साथ अधिक समय तक शरीर में पड़े रहने की दशा का नाम `जीर्णरोग` है। शरीर में तीव्र रोगों को दबाते रहने से दमा का रोग भी हो सकता है तथा उसी प्रकार बुखार के रोग को दबाते रहने से भी टी.बी. का रोग हो सकता है। तीव्र रोगों के लक्षणों को दबा देने से उस समय तो अच्छा लगता है। किन्तु शरीर के अंदर से निकलने वाली गंदगी शरीर में रुकी रह जाती है और जीर्ण रोगों को उत्पन्न करती है। जीर्ण रोगों से ग्रस्त रोगी के शरीर की जीवनीशक्ति कमजोर हो जाती है।
तीव्र रोगों में कष्ट अधिक सहन करने पड़ते हैं लेकिन जीर्णरोगों में तीव्र लक्षणों के न होते हुए भी जीवन अत्यंत कष्टकारी और नीरस हो जाता है। जीर्ण रोगों को दूर करने के लिए विचारों की दृढ़ता, शुद्धता, धैर्य तथा चिकित्सकों पर विश्वास रहने की अधिक आवश्यकता होती है। प्राकृतिक चिकित्सा करने से जीर्ण रोग काफी अधिक समय में जड़ 
सहित नष्ट हो जाते हैं।
Kalpant Healing Center

Dr J.P Verma (Swami Jagteswer Anand Ji)
(Md-Acu, BPT, C.Y.Ed, Reiki Grand Master, NDDY & Md Spiritual Healing)
Physiotherapy, Acupressure, Naturopathy, Yoga, Pranayam, Meditation, Reiki, Spiritual & Cosmic Healing, (Treatment & Training Center)
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