Friday, 9 February 2018

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत


प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांत



प्राकृतिक चिकित्सा कोई चिकित्सा न होकर जीवन यापन का सही तरीका है। प्रकृति के नियमों के विरुद्ध चलने पर शरीर में अनेक तरह के विजातीय तत्व पैदा हो जाती हैं, ओर उनके लक्षण रोंग कहलाते हैं। और प्राकृतिक के नियमों पर चलने से हम निरोंग होते हैं।प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धांतों से रोगों की चिकित्सा करना प्राचीन सभ्यता की देन है हमारें पूर्वजो ने संभवतः पशुओं व पक्षियों से प्रेरणा लेकर ही प्राकृतिक चिकित्सा को आरंभ किया था। इसमे रोगता से निरोंगता के लक्षण के तरीके को प्राकृतिक चिकित्सा कहा जाता है। इसके 10 मुख्य सिद्धांत है। 

1 -सभी रोंग, रोंगों का कारण व रोंगों का निवारण एक है।-: प्राकृतिक चिकित्सा का यह मुख्य सिद्धांत है कि सभी रोंग एक हैं, और उन सब के कारण भी एक है, और उनका निवारण भी एक ही है। जैसे सोने के बहुत सारे आभूषण बनाए जाते हैं, और उनके नाम अलग-अलग होते हैं, जैसे गले का हार, नाक की नथनी, माथे का टीका, हाथ के कंगन आदि लेकिन सभी का मूल केवल सोना होता है। ठीक उसी प्रकार शरीर के बहुत सारे रोंग गठिया, मधुमेह, हृदय रोंग, कब्ज, बुखार, खाँसी, जुखाम, बहुत से दर्द, स्वास, दमा, एलर्जी आदि रोगों का कारण केवल शरीर में विजातीय तत्वों का इकट्ठा होना होता है। ओर यह विजातीय तत्व ही रोंग है। जैसे आभूषणों में मूल सोना है, वैसे ही रोगों का मूल तत्व विजातीय तत्व हैं। अतः शरीर के सभी रोंग एक हैं विजातीय तत्व, और सभी रोगों का कारण भी एक है कि विजातीय तत्वों का इकट्ठा होना, और उपचार भी एक ही है विजातीय तत्वों का शरीर से बाहर निकाल देना। इसीलिए प्राकृतिक चिकित्सा में मनुष्य का मूल रोंग तो खत्म होता ही है साथ ही और बहुत से रोंग जो शरीर में होते हैं या जो आने वाले होते हैं वह भी ठीक हो जाते हैं।

2 - रोंग का कारण कीटाणु विषाणु जीवाणु नहीं है-: आपने देखा होगा कि जब डेंगु, चिकनगुनिया, प्लेग, या कोई अन्य रोंग का प्रकोप फेलता है तो वह सभी लोगों को नहीं होता जबकि उन रोगों के कीटाणु, विषाणु, व जीवाणु पूरे संसार में व वातावरण में समान रूप से फैले हुए होते हैं। कुछ प्राणियों को रोंग पकड़ लेता है और बहुत से प्राणियों के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अगर कीटाणु रोंग का कारण होते तो सभी को एक साथ रोगी हो जाना चाहिए था, परंतु ऐसा नहीं होता, आखिर क्यों? क्योंकि रोंग का कारण कीटाणु नहीं होते। 

रोंग का कारण शरीर मैं स्थित विजातीय तत्व होते हैं। आइए जानते हैं कैसे, मान लीजिए एक कमरा बिल्कुल साफ है और उसके साथ में दूसरा कमरा गंदगी से भरा हुआ है। तो मक्खियां, मच्छर, कीटाणु, विषाणु, और जीवाणु सभी कहां पैदा होगें ओर  कहां जाएंगे अर्थात सभी उस गंदगी वाले कमरे में जाएंगे और वहाँ पर पहुंचकर अपनी संख्या को बढ़ा देंगे। ओर साफ कमरा कीटाणुओं, विषाणुओं व जीवाणुओंसे बचा रहेंगा  इसी प्रकार जब जिसके शरीर में कीटाणु, विषाणु, जीवाणु, को पनपने योग्य विजातीय तत्व (गंदगी) इकट्ठे होंगे, उन्ही लोगों में वह रोंग फैलेगा ओर जिसके शरीर में विजातीय तत्व (गंदगी) नहीं होंगी उसकी प्रतिरोध क्षमता अधिक होगी और उसका वातावरण में फैले हुए कीटाणु, विषाणु, जीवाणु कुछ नहीं बिगाड़ सकते है। और वह निरोंग रहता है। इससे पता चलता है कि रोंग का कारण हमारे शरीर में इकट्ठी गंदगी है ना कि कीटाणु विषाणु या जीवाणु।

3 - तीव्र रोंग हमारे मित्र हैं। -: हमारें शरीर में पोषण व निष्क्रासन कि प्रक्रिया निरंतर चल रही है। जो हम प्राकृतिक खाना खाते हैं तो खाना खाने के बाद हमारा शरीर उससे पोषण प्राप्त करता है, और पोषण के बाद जो वेस्टेज (विजातीय तत्व) बचते है उन्हें वह शरीर से बाहर निकाल देता है। लेकिन प्रत्येक के शरीर की पोषण व निष्कासन की क्षमता अलग-अलग होती हैं। हम नित्य प्रति बहुत से अप्राकृतिक आहार जंक फूड, फास्ट फूड, चाइनीज फूड व बाजार का खाना खा रहे हैं। अप्राकृतिक आहार से हमारे शरीर में पोषण व शोषण की क्रिया धीमी होती है या बहुत कम होती है, और निष्क्राशन के लिए विजातीय तत्व (बेस्टेज) ज्यादा पैदा होते है, जिसको शरीर बाहर नहीं निकाल पाता, और जब यह शरीर से बाहर नहीं निकलते है, तो शरीर में इकट्ठे होकर रोंगों का रुप ले लेते हैं। हमारा शरीर विजातीय तत्व को निकालने के लिए दस्त, उल्टी, बुखार आदि शरीर में पैदा करता है जिसको हम रोंग होना कहते हैं। लेकिन यह रोंगों को रोकने का, निरोंग करने का, प्राकृतिक तरीका हैं। जिससे शरीर से विजातीय तत्व निकल जाते हैं। ओर हम स्वास्थ्य प्राप्त करते है। इसलिये रोंग हमारे मित्र होते है।
जब पेट में विजातीय तत्व इकट्ठे होगे तो उल्टी व दस्त लगेगे, ओर सिर में होंगे तो जुखाम आदि, इस प्रकार रोंग वास्तव में चिकित्सा है, जो हमें निरोगता देने के लिये आते है ओर हमें उनका हमेशा स्वागत करना चहिये।

विशेष :वास्तव में तीव्र रोगों का मुख्य कार्य हमें हमारे शरीर में उपस्थित विजातीय द्रव्यों के प्रति सचेत करना होता है। इसका कारण यह है कि रोगी में या तो जीवनीशक्ति बहुत कम होती है अथवा शरीर में स्थिति विजातीय द्रव्य की मात्रा अत्यधिक होती है या फिर उसका उपचार अपर्याप्त या हानिकर हुआ होता है। ऐसी स्थिति में प्रकृति अपनी सफाई का कार्य करने में असफल रह जाती है तो रोगी की मृत्यु हो जाती है। थककर सोने में जो सुख मिलता है या भोजन करने से व्यक्ति को शांति मिलती है उसी प्रकार की सुखशांति व्यक्ति को रोग से मुक्त होने के बाद मिलती है। रोग से मुक्त होने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि उसका शरीर हल्का हो गया है तथा उसका शरीर नया हो गया है और एक बोझा उसके सिर से नीचे उतर गया है। यदि रोगी को इन सभी  बातों की अनुभूति (महसूस) नहीं होती है तो हमें यह समझना चाहिए कि रोग पूर्ण रूप से ठीक नहीं हुआ है।

4 - प्राकर्ति ही उपचारक है।-: प्रत्येक मनुष्य के अन्दर एक अद्भुत शक्ति होती है। जिससे वह जीवन यापन करता है। ओर जब तक वो शक्ति काम करती है, हम स्वास्थ्य रहेते है। इस शक्ति को ईस्वर, परमात्मा, आत्मा, आदि नमो से जाना जाता है। वोही हमारे शरीर को चलती है, रोगी करती है, ओर फिर स्वाश्थ्य प्रदान करती है।

जब हमारी गलत आदतों की वजह से व अप्राकृतिक आहार के कारण शरीर में विजातीय तत्व जमा हो जाते है, तो प्राकृति स्वयं उनको निकलकर उपचार करती है। अगर हम प्राकृति के कार्यो में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं डाले तो वह हमारे शरीर को स्वस्थ कर देती है। 

कोई भी दवा रोगी को ठीक नहीं करती है। ठीक तो प्राकृति को ही करना होता है। जब हड्डी टूट जाती है, तो एक जगह रोकने से फिर से जुड जाती है। ऐसे ही जब पेट खराब होता है, तो दस्त या उल्टी लगती है, ओर पेट सही हो जाता है। इस प्रकार सभी रोंगों का उपचार प्राकृति खुद करती है। हमको केवल प्राकृति के उपचार के तरीके को समझकर उसका सहयोग करना मात्र है, ओर जेसे ही हम उसके उपचार में सहयोग करते है हम निरोगी हो जाते है। इस प्रकार जिसको हम रोंग कहेते है वो प्राकृति का उपचार है।

5 – प्राकृतिक चिकित्सा में रोंग का उपचार नहीं करते है।-: सभी चिकित्सा पद्तियो में हम रोंग का विशलेषण करते है। उसको जानने की कोसिस करते है। ओर रोंग के अनुसार उपचार करते है। पर प्राकृतिक चिकित्सा में रोगी के शरीर का विश्लेषण करते है ओर उसके पुरे शरीर का उपचार करते है। ओर रोंग तो स्वयं ठीक हो जाते है। रोगी एक रोंग के उपचार के लिये आता है, ओर पूर्ण सभी रोंगों को ठीक कर के जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में उपचार से वो रोंग तो ठीक हो ही जाते है साथ में जो आने वाले होते है वो भी ठीक हो जाते है।

कभी कभी कुछ रोंग ठीक नहीं भीं हो पाते है, उनका कारण शरीर की जीवनी शक्ति, धेर्य, रोगी का विश्वास, विजातीय तत्वों की मात्रा, ओर पहेले लिये हुआ उपचार का विष, रोगी की आवस्था, व रोंग की समयावधि पर निर्भर करता है। इसलिए रोगी के शरीर का पूरा विश्लेषण कर के रोगी के उपचार को तय करना चाहिये ओर ठीक होने के समय की अवधि रोंग की समय अवधि के अनुसार माननी चाहिए, अगर रोंग को पांच वर्ष हो गये है तो ठीक होने में कम से कम पांच माह तो लगेगे ही, ओर रोगी को यह सब पहेले ही बता देना चहिये जिससे उसका विश्वास बना रहे।

सिरदर्द होने पर सिरदर्द की दवा नहीं होनी चाहिए बल्कि सिरदर्द होने का कारण पाचनसंस्थान का दोष अथवा पूरे शरीर के रक्तविकार की चिकित्सा होनी चाहिए। जिससे सिर का दर्द स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली द्वारा सभी प्रकार के रोगों को ठीक किया जा सकता है लेकिन सभी रोगियों को नहीं। रोगी का अच्छा होना अथवा न होना निम्नांकित 5 बातों पर निर्भर करता है।
रोगी के शरीर में एकत्रित विजातीय द्रव्य (मल) कितनी मात्रा में है।
रोग को नष्ट करने के लिए उपयोगी जीवनीशक्ति रोगी के शरीर में है अथवा नहीं है।
रोगी अपने रोग का कितना इलाज कर चुका है अथवा कर रहा है, कहीं वह धैर्य को तो नहीं खो रहा है।
रोग से पीड़ित व्यक्ति प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली में विश्वास रखता है अथवा नहीं। 
उपयुक्त बातों को हम एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं -
मान लीजिए कि टी.बी. की बढ़ी हुई अवस्था में प्राकृतिक चिकित्सा करने पर भी बहुत से रोगी मर जाते हैं। लेकिन यह निश्चित होता है कि प्राकृतिक चिकित्सा के बीच के समय मरने वालों की मृत्यु शांतिदायनी होती है। उपवास, फलाहार आदि के द्वारा रोगी का शरीर निर्मल हो जाता है जिसके कारण मरते समय व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि आरम्भ से ही प्राकृतिक चिकित्सा होने के बावजूद रोगी की मृत्यु हो जाती है जिसमें रोगी के पैतृक रोग उसकी कमजोर जीवनीशक्ति और उसके पूर्व संस्कार के कारण होते हैं। प्राकृतिक चिकित्सकों का दावा होता है कि प्राकृतिक चिकित्सा से कभी भी किसी को हानि नहीं हो सकती है। ऐसा कभी भी नहीं होता है कि अन्य चिकित्सा प्रणालियों से बच सकने वाला रोगी प्राकृतिक चिकित्सा से न बच सके और मर जाए।

6 – रोंग के उपचार की जरुरत नहीं-: जेसा कि ऊपर लिखा है कि प्राकृतिक चिकित्सा में रोंग की चिकित्सा नहीं की जाती है, रोगी की चिकित्सा की जाती है। इसलिये रोंग के उपचार की जरूरत ही नहीं है, रोंग तो स्वयं ठीक हो जायेगा। एलोपैथी में रोंग का ईलाज करने पर बहुत से रोंगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता ओर वह जीर्ण रोंगों में बदल जाते है, ओर धीरे-धीरे विजातीय तत्व बढता जाता है, ओर प्राकृतिक चिकित्सा में विजातीय तत्वों को ही केवल बहार निकाला जाता है, जिससे रोंग स्वयं ठीक होते है। इसलिये प्राकृतिक चिकित्सा में रोंग के उपचार की जरूरत ही नहीं है।

7 - असाध्य रोंगों के उपचार में समय लगता है।-: प्राकृतिक चिकित्सा में रोंग बहुत जल्दी ठीक किये जा सकते है, परन्तु रोगी जब तक प्राकृतिक चिकित्सा में नहीं आता जब तक सब जगह से निराश नहीं हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में तो रोगी जब आता है, जब वो वर्षों बहुत से ईलाज करा चुका होता है, ओर रोंग आसाध्य हो चुका होता है। फिर वह चाहता है की में प्राकृतिक चिकित्सा में कुछ दिनों में ही ठीक हो जाऊ, जब अन्य उपचारों में वर्षो में ठीक नहीं हुआ तो प्राकृतिक चिकित्सा कोई जादू नहीं है, जो पलक झपकते ही ठीक कर देगी। अगर रोगी रोंग होते ही प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा ले तो कोई रोंग ऐसा नहीं जो प्राकृतिक चिकित्सा से पहेले अन्य उपचारों से ठीक हो सकता है।  

प्राकृतिक चिकित्सा में समय लगने के बहुत से कारण होते है। जिनमे शरीर में दवाओं का विष इकठ्ठा होना मुख्य है। एक तो रोंग का विष, दूसरा दवाओं का विष, जो कई वर्षो में जमा हो चूका होता है, निकलने में समय लेता है। दूसरा रोंग एक दिन में पैदा नहीं होता, वह धीरे-धीरे वर्षो में हुआ होता है। हार्ट अटेक को ही ले ले, अटेक तक पहुचने में कम से कम 20 वर्ष लगते है। मगर आजकल के खानपान के कारण जल्दी भी हो जाता है। तो जब प्राकृति को 20 वर्ष रोंग पैदा करने में लगे, तो ठीक भी उसही प्राकृति को करना है, तो प्राकृतिक चिकित्सा में समय तो लगेगा ही, प्राकृतिक चिकित्सा में रोंग को ही ठीक नहीं करते, नवजीवन प्रदान किया जाता है, ओर पूर्ण स्वस्थ किया जाता है। वृक्ष को पैदा होने में समय लगता है इसीप्रकार नवजीवन में समय लगना स्वभाबिक है। फिर भी आशा की जाती है कि अगर रोंग 20 वर्ष पुराना है, तो 20 महीने तो ठीक होने में लगते ही हैं। अगर विजातीय तत्व बहुत अधिक है तो ओर भी अधिक समय लग सकता है। ओर कम है तो कम समय लगता है।

8 - प्राकृतिक चिकित्सा में पुराने दबे रोंग निकलकर ठीक होता है-: जब हम प्राकृतिक चिकित्सा शुरू करते है, तो कई बार रोंग बढ़ जाता है, या कोई ओर रोंग पैदा हो जाता है। परन्तु ये जल्द ही ठीक हो जाते है, इनमे प्रत्येक में 2 से 7 दिन तक लग सकते है। इसका मुख्य कारण हमारे द्वारा रोंगों को होते समय दवाओ के द्वारा दबा देना होता है। हम जिस क्रम में रोंगों को दवाते है रोंग उसके विपरीत क्रम में पैदा होते है। 
मान लो किसी को जुखाम हुआ, वो दवा से दबा दिया, फिर खाँसी हुई, वो भी दबा दी, फिर बुखार हुआ, उसे भी दबा दिया, फिर सर दर्द हुआ, वो भी ठीक हो गया। अब जब भी वो रोगी प्राकृतिक चिकित्सा में किसी भी उपचार के लिये जाएगा तो जो रोंग दबा दिये गये है, वो क्रम से पैदा होगे। परन्तु उनका क्रम उल्टा होगा, सबसे पहेले शुरू के सात दिनों में सर दर्द होगा, वो ठीक हो जायेगा, फिर बुखार होगा, 14 से 21 दिन में वो ठीक होगा, फिर खाँसी होंगी उसके ठीक होने के बाद जुखाम होगा, ओर वो भी ठीक हो जायेगा, इस प्रकार एक एक करके सभी रोंग ठीक हो जायेगे ओर शरीर पूर्ण स्वस्थ हो जायेगा। इस प्रकार प्राकृतिक चिकित्सा से सभी रोंग एक बार में ठीक हो जाते है ओर नवजीवन प्राप्त होता है।

विशेष :लोगों को मल-मूत्र त्याग करते समय जो भी थोड़ी सी परेशानी होती है वह प्राकृतिक चिकित्सा का उभार होता है क्योंकि मल-मूत्र त्याग के बाद हमारा शरीर पहले से हल्का प्रतीत होता है। महिलाओं में प्रतिमाह मासिकधर्म का होना, प्रसव के समय होने वाला दर्द, पके हुए फोड़े का असहनीय दर्द और टीसन तथा शरीर में चुभे हुए कांटे को निकालते समय का दर्द आदि सभी `प्राकृतिक उभार` क्रिया के ही उदाहरण हैं। सभी तीव्र रोग जैसे हैजा, ज्वर, चेचक आदि हमारे मल से भरे शरीर से, शरीर की जीवनीशक्ति द्वारा, मल को अधिक वेग के साथ निकाल फेंकने में शीघ्रता करते हैं, उसे हम रोगों का तीव्र या तीव्र उपशम संकट कहते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि रोगों के इलाज के समय में रोग का उभार होना कितना कल्याणकारी, मंगलमय और आवश्यक है, जिससे हमें बिल्कुल भी घबराना और डरना नहीं चाहिए। हालांकि उभार को जल्दी लाने और उसे तेजी से नष्ट करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि इस समय जल्दबाजी करना हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। प्रकृति द्वारा धीरे-धीरे कार्य करने का नियम यहां भी अपनाना चाहिए। परेशान करने वाले उभार उन्हीं व्यक्तियों में होते हैं जो व्यक्ति रोगों के उपचार के लिए पहले ही विषाक्त औषधियों का सेवन कर चुके होते हैं और जिनको निकालने में प्राकृतिक चिकित्सक अधिक जल्दी करते हैं। जो लोग प्राकृतिक जीवनयापन करते हैं और दवाओं से बचे रहते हैं उनके बीमार पड़ने के बाद ठीक होने के समय उभार होते ही नहीं हैं या तो बहुत अधिक हल्के होते हैं और इतने से ही पूरी तरह से स्वस्थ हो जाते हैं।

9 - प्राकृतिक चिकित्सा में केवल शरीर की नहीं मन व आत्मा का भी उपचार करते है-: हमारे शरीर का सम्बन्ध मन व आत्मा दोनों से है। जब तक मन व आत्मा स्वस्थ नहीं होंगी, तब तक शरीर स्वस्थ नहीं हो सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा में हम केवल शरीर को ठीक नहीं करते मन ओर आत्मा का भी विभिन्न विधियों से उपचार करते है। आजकल 90% रोंग मन के द्वारा होते है, ओर जब वो गहेरे में अवचेतन मन में चले जाते है तो हमारे संस्कार बन जाते है। जब तक हम अपने मन से व आत्मा से रोंगों को खत्म नहीं करते तब तक पूर्ण स्वस्थ नहीं होते है। प्राकृतिक चिकित्सा में योग, प्राणायाम, ध्यान व अनेक हिलिग उपचारों के द्वारा मन व आत्मा का उपचार किया जाता है।
मनुष्ये हमेशा दुखों से, आनंद की अतृप्ति से, प्राप्ति से असंतुष्ट व जीवन की निराशा से ग्रस्त होते हैं। जिससे जीवन के प्रति मोह भंग होता जाता है, ओर मन में ग्रंथियों का निर्माण होता है। जब यह ग्रंथिया, कुंठाऐं, अवरोध, निराशा, अतृप्ति, असंतुष्टताव मनोरोगिक समस्याएं तीव्र, गंभीर व घातक होती है, तब मनोरोगिक व मनोदैहिक रोग पैदा होते हैं। और पागलपन प्रकट होता है। यदि ये ग्रंथिया, कुंठाऐं, अवरोध, निराशा, अतृप्ति, असंतुष्टताव मनोरोगिक समस्याएं तीव्र, गंभीर व घातक न हो तो परिणाम स्वरूप, बीपी, शुगर, ह्र्दय रोग, हार्मोनल रोग, सदमा, कलेश, खिन्नता, विषाद, अप्रसंता आदि के रूपो में प्रकट होती है। ज्यादातर समस्याएं असंतुष्टता के रूप मे ही शुरू होती हैं। यह असंतुष्टता व्यक्तिगत स्वयं से व अन्य लोगों के प्रति संबंधों में भी हो सकती है।

आज विज्ञान भी सहमत है, कि मन से रोंग होते हैं। इसके अंतर्गत न्यूराइट्स, तंत्रिका शोथ, मधुमेह रोग, हृदय रोग, हाई बीपी, लो बीपी, अल्सर, अनिंद्रा, हाईपरटेन्सन, आदि रोग मन से ही होते हैं। तीव्र ईष्र्या व घृणा से अल्सर मन्दाग्नि व पेट रोग होते हैं। आत्म ग्लानि से क्षयरोग पैदा होते हैं। डर से हद्रय रोग पैदा होते हैं। क्रोध से लकवा व पागलपन पैदा होता हैं। हमारे शरीर मे इतनी जीवनीशक्ति व प्रतिरोधक शक्ति होती है, कि वह रोग उत्पन्न होने से रोक सके। मनोरोगिक समस्याएं इस शक्ति को कमजोर करती हैं, और रोंग उत्पन्न होते हैं। स्वच्छ, शांत, व स्थिर मन शरीर के अपने कार्यो को निर्विघ्न पूरा करने का मौका प्रदान करता है। प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा शरीर व मन को अधिक शांत व शिथिल करना सीखकर हम रोगो से मुक्त हो सकते हैं। प्रत्येक मनुष्ये अपने आप में पूर्ण है, था, और हमेशा रहेगा।  अति गहराई में जाकर हम यह निसंदेह एकदम सत्य है जान सकते है, वह जो चाहे पा सकता है, जो चाहे कर सकता है, लेकिन हर मनुष्य के लिए यह संभंव नहीं, क्योंकि वह मान्यताओ व संस्कारों की समस्याओं से ग्रस्त है। वह जीवन की सत्यता को व स्वयं को स्वीकर नहीं कर पाते। अथाह निरोग रहेने के लिये समस्याओं का निराकरण करना ही होगा। प्रत्येक मनुष्य के अपनें संस्कार, मान्यताऐ, भावनाऐ, अनुभूतियां, बोधिक इच्छाऐ है। सबका जीवन जीने का व संबंधओ को निभाने का अलग-अलग तरीका है। इन्हीं विभिन्न पक्षों में संतुलन प्राकृतिक चिकित्सा में योग, प्राणायाम, ध्यान व अनेक हिलिग उपचारों के द्वारा किया जाता है।

10 - प्राकृतिक चिकित्सा में उत्तेजक दवाओं का प्रयोग नहीं करते-: हम रोंगों को ठीक करने के लिये विभिन्न जहरीली दवाईयों का प्रयोग कर रहें है। जो न केवल शरीर को कमजोर करती है, वह हमारी आत्मा व मन को भी कमजोर करते है। ओर शरीर में हर दवा का कोई न कोई साईड इफेक्ट होता ही है। जिससे हमारी जीवनी शक्ति व प्रतिरोध क्षमता भी कम हो जाती है। एक प्राकृतिक चिकित्सा ही इसी विधि है जिसमे किसी दवा का प्रयोग नहीं किया जाता है। हम जो खाद्य पदार्थ जीवन चलाने के लिये प्रयोग करते है, वोही रोंग होने पर ठीक करने के लिये करते है, पर प्रयोग का तरीका बदल जाता है। ओर प्राकृतिक चिकित्सा में केवल विजातीय तत्व को निकालने के लिये महतत्व, आकाशतत्व, वायुतत्व, अग्नितत्व, जलतत्व, पृथ्वीतत्व का प्रयोग करते है। इसलिये प्राकृतिक चिकित्सा में उत्तेजक दवाओं का प्रयोग नहीं किया जाता है या इसकी जरुरत ही नहीं पड़ती है।
Kalpant Healing Center
Dr J.P Verma (Swami Jagteswer Anand Ji)
(Md-Acu, BPT, C.Y.Ed, Reiki Grand Master, NDDY & Md Spiritual Healing)
Physiotherapy, Acupressure, Naturopathy, Yoga, Pranayam, Meditation, Reiki, Spiritual & Cosmic Healing, (Treatment & Training Center)
C53,  Sector 15 Vasundra, Avash Vikash Markit, Near Pani Ki Tanki,  Ghaziabad
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