Monday, 26 February 2018

रोगों के प्रकार और उनका वर्गीकरण



रोगों के प्रकार और उनका वर्गीकरण :

विद्वानों ने स्वास्थ्य की दृष्टि से हमारे शरीर के रोगों के विभिन्न पहलुओं को निर्धारित किया है जो निम्न हैं-

1. आध्यात्मिक।

2. मानसिक।

3. शारीरिक।

वही व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ होता है जो मन, आत्मा और शरीर तीनों से स्वस्थ होता है। यदि कोई भी व्यक्ति इन तीनों में से किसी की उपेक्षा रखता है तो वह कभी भी पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं रह सकता है। मन, आत्मा और शरीर के आधार पर ही रोग भी तीन प्रकार (शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक) के होते हैं।

1. आध्यात्मिक रोग : शरीर, मन और आत्मा का ऐसा घनिष्ठ सम्बंध होता है कि जो लोग शारीरिक रूप से स्वस्थ होंगे। उनकी आत्मा भी स्वस्थ होगी। इस संसार को बनाने वाले ईश्वर में अविश्वास करना ही सबसे बड़ा आध्यात्मिक रोग होता है। असत्य बोलना, अज्ञानता आदि रोग भी इसी के अर्न्तगत आते हैं।



2. मानसिक रोग : मानसिक रोग हमारे स्वास्थ्य की दृष्टि से शारीरिक रोगों से भी अधिक खतरनाक और अनिष्टकारी होते हैं। मानसिक रोगों के उत्पन्न होने का कारण विभिन्न प्रकार की छोटी-छोटी सी बातें होती हैं। यद्यपि हम इन छोटी-छोटी बातों को अपने विवेक से सुलझाकर मानसिक रोगों से आसानी से बच सकते हैं। मानसिक रोगों के अन्तर्गत घृणा, प्रतिहिंसा, आलस्य, लोभ, चिंता, अहंकार, निराशा, ईर्ष्या, अज्ञानता, भय, कामलिप्सा, असहिष्णुता, अविश्वास, स्वार्थपरता मानसिक उन्माद और वहम आदि होते हैं।

मानसिक रोग होने के कारण : वैसे तो देखने में मानसिक रोग, शारीरिक रोगों से अलग प्रतीत होते हैं किन्तु उनके कारणों में भिन्नता नहीं होती है। इसके उत्पन्न होने का एकमात्र कारण भी शरीर में उपस्थिति विजातीय द्रव्य होते हैं। जब शरीर में विजातीय द्रव अधिक बढ़ जाता है तो वह पीठ की ओर से रीढ़ की हडि्डयों से होता हुआ मस्तिष्क की कोमल ज्ञानेन्द्रियों को प्रभावित करता है। शरीर की जीवनशक्ति के ह्यास और अप्राकृतिक जीवन के फलस्वरूप पाचनशक्ति के खराब होने से विजातीय द्रव्य धीरे-धीरे शरीर में एकत्र होकर मानसिक रोगों को उत्पन्न कर देते हैं। इन रोगों का होना अथवा न होना विजातीय द्रव्य की वृद्धि और मात्रा पर निर्भर करता है। पृष्ठ भाग में विजातीय द्रव्य का भार बढ़ जाने से आमाशय की नाड़ियों, सुषुम्ना आदि पर अधिक प्रभाव पड़ता है जो मानसिक रोगों का प्रमुख कारण होता है। जो व्यक्ति संयमी और सात्विक विचार रखने वाले होते हैं उन्हें मानसिक रोग कम होते हैं।

मानसिक रोग अथवा मनोविकार शारीरिक स्नायु के मार्ग को अवरुद्ध करके, तन्तुओं को नष्ट करके जीवन शक्ति की क्रिया में बाधक होकर मल को शरीर से बाहर निकलने से रोक देते हैं। इससे शारीरिक रोग अधिक हानिकारक हो जाते हैं। धैर्य का अभाव होना, क्रोधी और चिड़चिडे़ स्वभाव से बुखार बढ़ता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शरीर में खून की कमी, हृदय रोग, हिस्टीरिया, स्नायु की दुर्बलता, वीर्य दोष यहां तक कि लकवा और टी.बी. जैसी खतरनाक बीमारियों के उत्पन्न होने का मूल कारण मानसिक विकार ही होते हैं। यह एक सच्चाई है कि हमारे शरीर के लगभग 90 प्रतिशत रोग केवल मानसिक विकार के कारण होते हैं। कुछ मानसिक रोग निम्नलिखित हैं।



1. भय : भय एक मानसिक रोग है। भय का आघात स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होता है। भय से पीड़ित व्यक्ति की कभी-कभी मृत्यु भी हो जाती है। जब किसी के शरीर में भय की भावना उत्पन्न होती है तो उसका शरीर विष से भर जाता है तथा हृदय की धड़कन बढ़ जाती है। इससे आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है और कभी-कभी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। भय से पीड़ित व्यक्ति की भूख और प्यास समाप्त हो जाती है तथा दस्त आदि के साथ-साथ विभिन्न शारीरिक विकार हो जाते हैं। भय से व्याकुल रोगी थर-थर कांपते हुए निर्जीव सा हो जाता है।



2. क्रोध : क्रोध भी एक हानिकारक मानसिक रोग है। इसके विभिन्न रूप होते हैं। जब किसी व्यक्ति को क्रोध आता है तो उसके शरीर में तीव्र विष की उत्पत्ति होती है। क्रोध खून को जला देता है तथा शरीर की सभी ग्रंथियां `एड्रिनलीन` नामक एक विषैला रासायनिक पदार्थ उत्पन्न करती हैं जो रक्त में मिल जाती हैं। यदि किसी व्यक्ति को अधिक क्रोध आता है तो क्रोध के कारण उसकी पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है तथा भोजन के पाचन में सहायक रस विष में परिवर्तित हो जाता है।



3. चिंता : हमें किसी भी समस्या के आने पर विचलित नहीं होना चाहिए। यदि हम किसी बात को लेकर चिंतित होते हैं तो इसका हमारे शरीर बहुत अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है। चिंता करना शारीरिक स्वास्थ्य और सुंदरता का सबसे बड़ी दुश्मन मानी जाती है। किसी बात का भय होने से चिंता उत्पन्न हो जाती है। चिंता करने से भी क्रोध के समान ही हमारे शरीर के रक्त में रासायनिक परिवर्तन होता है जिसके कारण शरीर का रक्त अशुद्ध होकर सूखने लगता है। जिसके परिणामस्वरूप शरीर सूखकर कांटा हो जाता है। शरीर की त्वचा की चमक समाप्त हो जाती है, होंठों का रंग फीका पड़ जाता है, नाक गीली हो जाती है और गाल भी पिचक जाते हैं। ऐसे रोगियों की पाचन क्रिया शीघ्र ही प्रभावित हो जाती है जिसके कारण व्यक्ति टी.बी. से ग्रस्त हो जाता है। चिंता ग्रस्त रोगी को नींद नहीं आती है और उसे अपना जीवन भार के समान लगने लगता है।



4. ईर्ष्या-द्वेष : किसी से भी ईर्ष्या-द्वेष रखना मानसिक रोगों के अन्तर्गत आता है। मनोवैज्ञानिकों और आधुनिक औषधि विज्ञान ने अपनी खोजों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया है कि ईर्ष्या-द्वेष शरीर के लिए उतना हानिकारक हो सकता है जितना की तपेदिक और हृदय रोग। ईर्ष्या से हमारे शरीर के रक्त में विष का संचार हो जाता है। जब ईर्ष्या और द्वेष अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाते हैं तो इससे पागलपन उत्पन्न हो जाता है।



मानसिक रोगों से बचाव : मानसिक रोग बहुत ही हठीले और दु:साध्य होते हैं। परन्तु मानसिक रोग असाध्य नहीं होते हैं। परन्तु यदि आत्मबल कम हो, जीवनीशक्ति मर गई हो और शरीर में विजातीय द्रव्य का स्थान ऐसा हो कि प्राकृतिक उपचारों द्वारा उसका निकाला जाना सम्भव न हो तो ऐसे रोगों को असाध्य ही समझना चाहिए। मानसिक रोगों को मिटाने में मानसोपचार में अधिक सहायता मिलती है। मानसिक रोगों को रोकने में निम्नलिखित नियमों का पालन करने से सहायता मिलती है।

1. मन की शांति और अशांति के कारण की ओर से मन को हटा लेने का प्रयत्न करना चाहिए और उसके बारे में सोचना और विचार करना बिल्कुल ही बंद कर देना चाहिए।

2. हमेशा दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि हम किसी से अपने अधिकार का सम्मान तभी करा सकते हैं जब हम उसके अधिकारों का सम्मान स्वयं करेंगे।

3. हमें `नेकी कर और दरिया में डाल` की कहावत को चरितार्थ करते हुए दूसरों पर उपकार करते रहना चाहिए। यदि उन उपकारों का बदला न मिले तो हमें दु:खी भी नहीं होना चाहिए।

4. बात-बात पर उत्तेजित होना, उग्रता दिखाना, बहस करना, किसी को डराना और धमकाना, अपनी बात को सर्वोपरि रखना और अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आशा करना आदि अनेक मानसिक कमजोरियां होती हैं जो मनुष्य को अंदर ही अंदर खा जाती हैं।

5. जो मानसिक कष्ट, परेशानी, अड़चनें और बाधाएं उपस्थिति होती हैं, वे मात्र हमारे साथ ही नहीं वरन अन्य सभी के साथ भी हो सकती हैं। ऐसे विचारों से आत्मसंतोष की प्राप्ति होती है।

6. संसार के सभी कार्यों को भगवान की इच्छा समझते हुए अपने को निमित्त मात्र समझना चाहिए तथा ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण की भावना को ही अपना रक्षा कवच समझना चाहिए।

7. मन के अधिक चंचल हो जाने पर तेज आवाज से अच्छी पुस्तकों को पढ़ना चाहिए तथा भगवान का नाम लेकर ठंडा पानी पीना चाहिए अथवा उस स्थान से हटकर कहीं दूर चले जाना चाहिए।

8. मानसिक विकार होने पर अपने अपने मन से उलझना नहीं चाहिए तथा मन को अपना गुलाम और आज्ञाकारी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए जोकि उसका वास्तविक स्वरूप है।

9. हमें अपने आप में आत्मनिर्भरता, आत्म सम्मान और आत्मबल हमेशा भरते रहना चाहिए।



3. शारीरिक रोगों का वर्गीकरण : हमारे शरीर में विभिन्न प्रकार के विकार होते हैं जिनके रूप और लक्षण अलग-अलग होते हैं इनका विभाजन आयुर्वेद में चार श्रेणियों में किया गया है।



1. शरीर में विजातीय द्रव्यों के कारण जो रोग होते हैं वे शारीरिक रोग के अन्तर्गत आते हैं जैसे बुखार आदि।

2. अभिघात से जो पीड़ाएं होती हैं, उन्हें आगन्तुक रोग कहते हैं जैसे पेड़ से गिरना दुर्घटना आदि।

3. क्रोध, शोक, भय आदि रोगों को निमित्तक मानसिक रोग कहते हैं।

4. भूख, प्यास, बूढ़ा होना तथा मृत्यु को प्राप्त होना `स्वाभाविक` रोग के अन्तर्गत आते हैं।

हमारे शरीर के आंन्तरिक भाग में विजातीय द्रव्यों की उपस्थिति के परिणामस्वरूप जितने भी प्रकार के रोग होते हैं उन्हें दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।



रोगों से लाभ : इस विश्व में बहुत बड़ी संख्या ऐसे मनुष्यों की है, जिनकी यह एक मात्र धारणा नहीं बल्कि पूरा विश्वास है कि रोग हमारे दोस्त के समान होते हैं।



यहीं नहीं बल्कि कुछ लोगों का विचार तो यहां तक है रोग का होना मृत्यु का पेशखेमा होती है, किन्तु वास्तव में बात ऐसी नहीं है, रोग तो प्रकृति और माता का शुभाशीष और वरदान है अर्थात बीमार पड़ना हमारे शरीर के लिए ईश्वर का बड़ा वरदान है। वे व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली होते हैं जिनके शरीर में रोगों का आगमन होता है क्योंकि रोगों के आने से शरीर का संचित दूषित मल (जोकि विष बन चुका होता है) नष्ट हो जाता है। रोग हमारे शरीर के लिए सुधारक और दोस्त होते हैं न कि दुश्मन। रोग उत्पन्न होकर हमारे के किसी भाग या अंग के कमजोर होने को इंगित करता है कि इस भाग में विष एकत्र हो गया है। इसकी सफाई करनी चाहिए। हम जितनी शीघ्रता से रोग की चेतावनी पर ध्यान देंगे उतनी ही शीघ्र हमारा शरीर निरोगी हो जाता है। जिसके शरीर में यह चेतावनी नहीं मिलती है उनके शरीर की जीवनीशक्ति क्षीण होती जाती है।
Kalpant Healing Center
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