Sunday, 11 February 2018

प्राकृतिक चिकित्सा में समाहित कुछ अन्य चिकित्सा पद्धतियां


प्राकृतिक चिकित्सा में समाहित कुछ अन्य चिकित्सा पद्धतियां
Some other treatment systems contained in nature therapy

प्राचीन काल से ही हमें यह ज्ञात हो चुका है कि रोगों का इलाज हमारे चारों ओर उपस्थिति प्राकृतिक तत्वों की सहायता से किया जा सकता है। इन्हीं तत्वों के कारण ही हमारा जीवन चलता रहता है। यदि किसी कारणवश यह अंसतुलित हो जाता है तो हमारा स्वास्थ्य खराब हो जाता है। एक ऐसी प्राचीन चिकित्सा प्रणाली जो बिना दवाओं के ही, व्यायाम, विश्राम, स्वच्छता, उपवास, आहार, पानी, हवा, प्रकाश, मिट्टी आदि के संतुलित उपयोग से ही शरीर को रोगों से मुक्त कर देती है तथा व्यक्ति को स्वस्थ और दीर्घ जीवन का रास्ता दिखाती है वह ``प्राकृतिक चिकित्सा`` पद्धति कहलाती है। प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत विभिन्न चिकित्सा पद्धतियां आती हैं जो निम्नलिखित हैं-

1. योग चिकित्सा 2. जल चिकित्सा 3. सूर्य चिकित्सा 4. फल-सब्जी चिकित्सा

योग चिकित्सा
          हमारा देश योगियों का देश कहा जाता है। आज भी संसार में भारतीय योग का अपना विशेष महत्व है। पश्चिमी देशों में माना जाता है कि भारतीय पवित्र ग्रंथ `रामायण´ में वर्णित पुष्पक विमान का वर्णन केवल कल्पना मात्र नहीं है। रावण की नाभि में अमृत होने के कारण वह अमर हो गया था। इसके बारे में यूरोपीय देशों के वैज्ञानिकों को भी सच्चाई नज़र आती है। महाभारत के युद्ध में प्रयुक्त अस्त्रों में परमाणु संपन्न अस्त्र भी थे। अब यह सिद्ध हो चुका है कि महाभारत के युद्ध के बाद श्रीकृष्ण भगवान द्वारा अर्जुन के रथ से उतरते ही रथ का जल जाना योगिराज भगवान कृष्ण के कारण ही था। योगिराज भगवान कृष्ण ने योग के बल पर ही गोवर्धन पर्वत को एक ही हाथ की अंगुली पर उठा लिया था। इसी बल के कारण ही हनुमान जी हिमालय से गंधमादन पर्वत को उठाकर लाये थे। भगवान श्रीकृष्ण का चक्र सुदर्शन इच्छा की गति पर चलता था। आदिकवि शंकराचार्य ने योग के बल से ही अपना शरीर त्यागकर दूसरी देह को धारण करके `कामशास्त्र` को सीखा और इसके बाद पुन: अपने शरीर में आ गये। यह सब योग के कारण ही सम्भव हुआ था।
          जापानी डाक्टरों ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया है कि योग शास्त्र में बताए गये शरीर के भीतर मौजूद छहों चक्रों में अनन्त ऊर्जा भरी हुई है। इन चक्रों को जागृत तथा नियंत्रित करने से चमत्कारिक शक्तियां उत्पन्न होती हैं। पंताजलि ऋषि ने योग को शरीर में छिपी हुई क्षमताओं के उपयोग का साधन माना है।
          ऋग्वेद, अथर्वेद तथा पूर्व उपनिषदों में योग की विभिन्न मुद्राओं तथा उनके चमत्कारिक प्रभावों का वर्णन किया गया है किन्तु चिकित्सा के क्षेत्र में योग के प्रयोगों पर सर्वप्रथम यूरोपीय देशों के वैज्ञानिकों ने अपना ध्यान दिया जब उन्होंने देखा कि शीर्षासन करने से मस्तिष्क के उन अंगों में रक्त जाता है जिसमें रक्त प्रवाह प्राय: कम ही होता है। सभी आसनों का अध्ययन करने के बाद जब 1945 के बाद शोध अध्ययनों के आधार पर योग के प्रभावों को सिद्ध करने की कोशिश की गई तो इसके फलस्वरूप `योग चिकित्सा´ एक अलग ही विद्या बन गई। वर्तमान समय में संपूर्ण विश्व के लोग योगासनों के प्रति आकर्षित होकर योगों को अपना रहे हैं।
योगसूत्र के 8 भाग होते हैं जो निम्न प्रकार के होते हैं।

1. यम 2. नियम 3. आसन 4. प्राणायाम 5. प्रत्याहार 6. धारणा 7. ध्यान 8. समाधि
        
   इन सभी योगसूत्रों में `यम´ योग की पहली तथा `समाधि´ सबसे अंतिम अवस्था होती हैं। `योग चिकित्सा´ में सिर्फ आसनों तथा उससे होने वाले प्रभावों के बारे में चर्चा की जाती है। आमतौर पर यम, नियम, आसन और प्राणायाम हमारे शरीर को सभी प्रकार से समृद्ध बनाने के लिए बहुत ही आवश्यक माने जाते हैं। प्राणायाम के साथ-साथ ध्यान के भी अलग-अलग प्रभाव होते हैं। प्राणायाम, ध्यान के योग से अलग-अलग परिणाम प्राप्त होते हैं। योग के अनुसार प्राण का प्रवाह नाड़ी तंत्र के द्वारा हमारे शरीर के सभी अंगों में होता रहता है। `रोग´ इस बात का संकेत है कि कहीं प्राण के प्रवाह में अवरोध (बाधा) है। नाड़ियों के 7 केन्द्र हाथों और पैरों में होते हैं। योग के विभिन्न आसनों का प्रभाव हमारे पूरे शरीर में प्राण-प्रवाह को सुचारु रखने पर भी पड़ता है। योग की सभी मुद्राओं का प्रवाह प्रथक अंगों के प्रभाव से होता है। नियमित रूप से योगासन करने से शरीर के किसी भी अंग में प्राण का प्रवाह सुचारु रूप से होता रहता है। योगासन करने वाला व्यक्ति अपने पूरे जीवन में शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ बना रहता है।
विशेष :
          हमें किसी विशेषज्ञ की देखरेख में ही योगासन करना चाहिए। बिना विशेषज्ञों की देख-रेख के आसन करने से हमारे शरीर को लाभ के बजाय हानि होने की अधिक संभावना बनी रहती है। आसनों का प्रारम्भ योग्य और अनुभवी प्रशिक्षकों की देख-रेख में ही करना चाहिए। योगासनों को करने की सीमाएं भी होती हैं जिन्हें `यम´ कहते हैं जैसे योगासन करने वाले व्यक्तियों को किसी भी परिस्थिति में असत्य बोलना, चोरी, धोखाधड़ी आदि नहीं करना चाहिए तथा उन्हें नियमपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। योगासनों को करने के विभिन्न नियम होते हैं जिनसे शरीर को योग करने के लायक बनाया जाता है।
          ``धौती क्रिया´´ में जितना हो सकता है उतना अधिक पानी पीते हैं और फिर किसी ऊंचे स्थान पर बैठकर गले के अंदर दो अंगुलियां डालते हैं। ऐसा करने से उल्टी होनी शुरू हो जाती है। इससे हमारे पेट के आंतरिक विकार दूर हो जाते हैं तथा गला भी साफ हो जाता है।
          ``नेती ´´ में चुल्लू भर पानी हाथ में लेकर नाक के एक तरफ के नथुने से ऊपर की ओर हल्का सा खींचते हैं इसके बाद दूसरे नथुने को बंद करके जोर से बाहर की ओर छींकने से नाक साफ हो जाती है। इसी प्रकार से दूसरे नथुने को भी साफ किया जाता है। खींचने वाले पानी में हल्का सा नमक मिला लेते हैं। ``धोती`` तथा ``नेती`` से पेट, गले तथा नाक से संबंधित विभिन्न रोगों में लाभ मिलता है। `नेती´ एलर्जी के लिए बहुत ही लाभकारी क्रिया होती है।
          `त्राटक` क्रिया में आंखों के विभिन्न विकार जैसे भेंगापन (तिरछा दिखाई देना) तथा मस्तिष्क का इधर-उधर भटकना समाप्त हो जाता है। इस विधि में आंखों से लगभग 120 सेमी की दूरी पर एक मोमबत्ती जलाकर रख देते हैं। इसके बाद उस जलती हुई मोमबत्ती को लगातार तब तक देखते हैं कि जब तक कि आंखों में आंसू न आ जाए। प्रारम्भ में एक मिनट तक त्राटक करने के बाद एक मिनट तक आंखों को बंद करके आराम देते हैं। इसके बाद जितना समय आगे बढ़ाते हैं उसी के अनुसार उतने ही अधिक समय तक आंखों को आराम भी दिया जाता है। त्राटक की सिद्धि से सम्मोहन की शक्ति भी बढ़ती है। इसके अतिरिक्त योगासनों के अन्य तरीके जैसे `नौली´ और `कल्पावत´´ हैं। यह पेट और फेफड़ों से संबंधित होते हैं।
Kalpant Healing Center

Dr J.P Verma (Swami Jagteswer Anand Ji)
(Md-Acu, BPT, C.Y.Ed, Reiki Grand Master, NDDY & Md Spiritual Healing)
Physiotherapy, Acupressure, Naturopathy, Yoga, Pranayam, Meditation, Reiki, Spiritual & Cosmic Healing, (Treatment & Training Center)
C53,  Sector 15 Vasundra, Avash Vikash Markit, Near Pani Ki Tanki,  Ghaziabad
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