Thursday, 8 February 2018

विज्ञान व प्राकृति

2   - विज्ञान व प्राकृति

आज का मनुष्य जिस युग, समाज, परिस्थिति व परिवार में जी रहा है। वह अनेक समस्याओं से ग्रसित होता जा रहा है। उसके चारों ओर शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, अध्यात्मिक, आत्मिक, आधिभौतिक व आदिदैहिक समस्याओं का चक्र बना हुआ है। राग, द्वेष, ईष्या, अहम, के प्रकम्पनों में प्रत्येक मनुष्य विक्षिप्त हो गया है। पश्चात्य संस्कृति में भारतीय संस्कृति पर काले बादल मंडला रहे हैं। मानवीयता व नैतिकता लुप्त होती जा रही है। और एक कुंठित समाज का स्वरूप हमारे सामने आ रहा है।

21वी सदी विज्ञान व टेक्नोलॉजी के चरम विकास की सदी है। परन्तु अध्यात्म, परमार्थ व संस्कारो को अपेक्षित कर केवल विज्ञान के विकास व टेक्नोलॉजी ने मनुष्य के लिए खतरा पैदा कर दिया है। इससे कोई भी अनजान नहीं है, कि आज हिंसा, आंतकवाद, नशा, कुविचार, नारी अत्याचार, कुंठितता, पाखंडता, असाध्य रोंग, व अनेक समस्याओं से मनुष्य ग्रस्त है। इनसे मुक्ति पाने के लिए विज्ञान के साथ अध्यात्मिकता, 21वी सदी के संस्कार व प्राकृति का सानिग्ध्य भी आवश्यक है।

आज समाज मे विनय, करूणा, श्रद्धा, धैर्य, संयम, सहनशीलता, दया, सम्मान जैसी उदार संस्कृति की भारतीय समाज को जरूरत है। हमारे विचारों को आध्यात्मिकता व सात्विकता की जरूरत है। जिससे हमारे व्यवहार में सामने वाले के लिए सम्मान पैदा हो। जब मनुष्य अध्यात्म से जुड़ता है, तो मनुष्य भोग से योग की ओर, प्रवृति से निवृत्ति की ओर, राग से त्याग की ओर, संहार से सृजनता की ओर विकास करता है। और समाज से अनेक हिंसक व अपराधिक कर्मों को रोकने में मदद प्राप्त होती है।


उसी प्रकार मनुष्य जब प्रकृति से जुड़ता है। पांच तत्वों का सान्निध्य प्राप्त करता है, तो शरीर में इनका संतुलन बनकर यह शरीर को रोंग मुक्त कर देता है। जहां प्रकृति के द्वारा प्रदत आहार (जो जिस रूप में प्राप्त हुआ है उसी रूप में) सेवन करने से हमारे मन को शीतलता प्रदान होती है, वही हमारे अंदर पैदा होने वाली उत्तेजना (क्रोध व हिंसक प्रवृत्ति) को भी शांति प्रदान होती है। जिससे हम मानसिक रूप से स्वस्थ हो जाते हैं। इस प्रकार विज्ञान के युग में प्रकृति व अध्यात्म से जुड़कर हम आनंद के स्वरूप को प्राप्त कर सकते हैं।
Kalpant Healing Center
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